जिन्दगी खड़ी एक दो राहे पर

जिन्दगी या जीवन क्या है? मौत अथवा मृत्यु क्या है? जन्म क्या है? वस्तुतः जन्म और मृत्यु के बीच की अवधि का नाम जिन्दगी है। जन्म जब चेतना के साथ शरीर का संपर्क होता है और मृत्यु जब चेतना शरीर का साथ छोड़ देती है। जीवन एक प्रक्रिया का नाम है जो समय के साथ परिवर्तित होती रहती है। समय ही इसका मूल आधार है।
जीवन की डोर बड़ी ही अजीब है। न जाने किन-किन रास्ते से चलती हुई, अगणित उतराव-चढ़ाव से गुजरती हुई, टेढ़े-मेढ़े पग डंडियों से लेकर राज-मार्ग को पार करते हुए अपने गंतब्य तक का सफर करती है। किसी को पता नहीं कि डोर का संचालन कैसे और क्यों हो रहा है। जितने लोगों से पूछा जाए उतना ही जबाब मिलेगा। कुछ न कुछ सवाल और जबाब आपके जेहन में भी जरूर कौंध रहा होगा। जिन्दगी क्या है- जैसा कि ऊपर कहा गया – जन्म और मृत्यु के बीच की अवधि. जितने चीजों पर हमारी नजर जाती है – सारे के सारे नश्वर हैं- उनकी अवधि निश्चित है। समय ने उन्हें बनाया और समय ही उन्हें नष्ट कर देगा। आपकी राय क्या है? क्या जिन्दगी की डोर का संबध समय के साथ है? क्या यह समय का ही पर्याय है? सच तो यह है कि समय ही हमें बनाता है, विभिन्न लोगों से मिलाता है और समय ही हमें मिटा देता है।
चल हट ! किधर आया है? केवल स्वाँग करने का ही दिल करता है? आखिर तू कब तक लोगों को धोखा देता रहेगा? और ये लोग हैं, जो बार-बार धोखा खाकर भी तुझे पहचान नहीं पाते? धन्य हैं ये? सब कुछ लुटाकर भी कुछ पाने की आशा में तेरे तरफ निहार रहे हैं। यदि नाटकबाजी सीखनी है, अभिनय में महारत हासिल करना है तो तुझसे सीखे। क्या धोखा तू दे रहा है वा हम खुद का रहे हैं? क्या मृगतृष्णा के तरफ दौड़ना ही इंसान की नियति बन चुकी है। क्या समय हमें धोखा दे रहा है वा हम समय को धोखा दे रहे हैं? हम समय के साथ स्वयं अभिनय कर रहे हैं अथवा
समय हमें धोखा दे रहा है? यह विचारणीय है।
खुले आकाश में उड़ने को भला किसका दिल नहीं चाहेगा? आकाश की ऊँचाइयों से भी ऊपर जाने को हरेक का दिल करता है। क्या आप इन बातों से सहमत हैं? किन्तु, यह सोच कर भी डर लगता है कि ऊँचाईयों का कोई आधार नहीं होता। हर क्षण गिरने का डर लगा रहता है। जमीन पर चलने वालों को यह डर नहीं होता।
जब भी किसी काम की सोचॊ, व्यवधान आना निश्चित है। सुगमतापूर्वक कोई भी कार्य का सम्पादन हो नहीं पाता। समस्या है- क्या करूँ और क्या न करूँ? व्यवधानों से जूझा जाए अथवा यह समझकर कि ये परिणांम का संकेत है- काम को बीच में ही छोड़ दिया जाए? समस्याओं से जूझने पर जीत मिल सकती है किन्तु इनसे भागने पर हार निश्चित है। भविष्य पर किसी का अधिकार नहीं। पूर्व में किए गए परिणामों का फल ही भविष्य है। भूत में किए गए काम तो हो चुके हैं- उन्हें सुधारा नहीं जा सकता। केवल वर्तमान ही हमारा है। हमारी जिन्दगी क्षणों में बँटी हुई है। यही एक क्षण है जिसे हम अपना कह सकते हैं। इस क्षण में हमारा सोच ही महत्त्वपूर्ण है। हमारे पास सिर्फ अपना सोच ही है और कुछ भी नहीं। और यह सोच किसी कार्य को करने और न करने तक ही सीमित है।

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