Shivashila शिवशिला

शिव शिला

 

एक पत्थर का टुकड़ा कहीं अनाम सा पड़ा हुआ, मगर कालान्तर उसी के समक्ष सर झुकाते हजारों लोग. यह भी कोई बात हुई? क्या सारे के सारे बेवकूफ हैं? एक पत्थर के सामने सर झुकाने से क्या लाभ? मगर इस मामूली से पत्थर से मनौतियाँ माँगते हजारों लोग आपको नजर आ जाएँगे. एक मामूली से पत्थर से शिव लिंग बन जाता है. क्यॊं महान माना जाता है – इस पत्थर अर्थात शिव लिंग को? यह शिव का द्योतक बन जात है. भोलेनाथ या महादेव, जिनका ना आदि है और ना ही अंत। ऐसा माना जाता है कि इस संपूर्ण सृष्टि के निर्माण से पहले सिर्फ शिवजी ही थे और प्रलय के बाद भी शिवजी रहेंगे। शास्त्रों के अनुसार तीन देव सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश। महेश अर्थात् शिवजी सभी मनोकामनाओं को सिद्ध करने वाले और सभी सुख-संपत्ति देने वाले देव हैं। शिव-लिंग- संचालक है – इस संसारका साकार स्वरूप. इसकी अर्चना करने वाले इसे भोले शंकरका स्वरूप मानते है.यह निराकर भी है क्योंकि शिव एक शिला के समान है,उसका कोई आकार/ स्वरूप नही . धर्म विशेष के लिए इसेचिन्हित नही किया जा सकता. जिसका वो शिव है, उसका दायित्व है सृष्टि का सुचारू रूपसे संचालन.अथवा यों कहा जा सकता है कि जो संसार के शिल्पकार है, शिव-बनाते है-मिटाने की भी जुगतकरते है और समय पर मिटा भी देते है.शिव स्वयं कुछ नही करते, भोले- भंडारी कहलातेहै.किन्तु, यदि कुछ करना होता है तो हमको-आपको देते है वरदान और हम-आप बनते है उनकेकार्य का साधन(मशीन). शिव का शाब्दिक अर्थ होता है –कल्याण. शिव को कुछ यों परिभाषित किया जाता है- सत्यम् शिवम् सुन्दरम् अर्थात् जो सत्य है, जो सुन्दर है वही शिव (कल्याणकारी) है.

शिव की पूजा मुख्य रूप से पुरूष एवम् प्रकृति के युग्म रूप की पूजा है. प्रकृति के साह्चर्य से ही पुरूष समाज के लिए कल्याणकारी होता है. इस पूजा में लिंग एवम् भग की पूजा सम्मिलित रूप से की जाती है. शंकर जिसे प्रलय एवम् बहुत गुस्से वाला देवता माना जाता है, प्रकृति के साथ मिलकर शिव अर्थात् कल्याणकारी हो जाता है. खुद के कष्टों की पवाह किए बिना दूसरॊं की देखभाल करना ही परम लक्ष्य है. शिव के पास कहने को कुछ भी अपना नहीं है. इन्हें औघड़ दानी भी कहा जाता है. थोड़े ही परिश्रम से खुश हो भक्तों को मालामाल कर देता है. शिवलिंग भगवान शंकर का प्रतीक है। उनके निश्छल ज्ञान और तेज का यह प्रतिनिधित्व करता है। जैसे कि ऊपर कहा गया है – ‘शिव’ का अर्थ है ‘कल्याणकारी’। ‘लिंग’ का अर्थ है ‘सृजन’। सर्जनहार के रूप में उत्पादक शक्ति के चिह्न् के रूप में लिंग की पूजा होती है। स्कंद पुराण में लिंग का अर्थ लय लगाया गया है। लय (प्रलय) के समय अग्नि में सब भस्म हो कर शिवलिंग में समा जाता है और सृष्टि के आदि में लिंग से सब प्रकट होता है। लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपर महादेव स्थित हैं। वेदी महादेवी की है। अकेले लिंग की पूजा से सभी की पूजा हो जाती है। वस्तुतः यह साकार एवँ निराकार दोनों रूप में ईश्वर की पूजा है – जो सर्वशक्तिमान है, शास्वत है, अनश्वर है और जो अजन्मा है, जो साकार और निराकार दोनों है.

हमारे धार्मिक ग्रन्थ में एक मंत्र आता है …. निरंजनो निराकारो… एको देवो महेश्वरः …  अर्थात .. निरंजन निराकार महादेव ही एकमात्र ईश्वर हैं……. और…. देवों के देव… महादेव….. शिवलिंग के रूप में पूजे जाते हैं….| परन्तु बहुत से लोगों का शिवलिंग का मतलब तक नहीं मालूम है! शिवलिंग का मतलब…. और शिवलिंग की महिमा …. शिवलिंग की अर्चना अनादिकाल से जगद्व्यापक है। संसार के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में लिंगोपासना की चर्चा मिलती है। शुक्लयजुर्वेदकी रुद्राष्टाध्यायी के द्वारा शिवार्चन एवं रुद्राभिषेक करने से समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं तथा अन्त में सद्गति भी प्राप्त होती है। रुद्रहृदयोपनिषद् का स्पष्ट कथन है- “सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:।“ अर्थात् शिव और रुद्र सर्वदेवमयहोने से ब्रह्म के ही पर्यायवाची शब्द हैं। प्राय: सभी पुराणों में शिवलिंगके पूजन का उल्लेख और माहात्म्य मिलता है। हिन्दू साहित्य में जहाँ कहीं भी शिवोपासनाका वर्णन है, वहाँ शिवलिंगकी महिमा का गुण-गान अवश्य हुआ है। लिंग शब्द का साधारण अर्थ चिह्न अथवा लक्षण है। सांख्य दर्शन में प्रकृति को, प्रकृति से विकृति को भी लिंग कहते हैं। देव-चिह्न के अर्थ में लिंग शब्द भगवान सदाशिवके निर्गुण- निराकार रूप शिवलिंग के संदर्भ में ही प्रयुक्त होता है। स्कन्दपुराणमें लिंग की ब्रह्मपरकव्याख्या इस प्रकार की गई है- “आकाशं लिङ्गमित्याहु:पृथ्वी तस्यपीठिका। आलय: सर्वदेवानांलयनाल्लिङ्गमुच्यते॥“ आकाश लिंग है और पृथ्वी उसकी पीठिका है। इस लिंग में समस्त देवताओं का वास है। सम्पूर्ण सृष्टि का इसमें लय होता है, इसीलिए इसे लिंग कहते हैं। शिवपुराणमें लिंग शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए कहा गया है- “लिङ्गमर्थ हि पुरुषंशिवंगमयतीत्यद:। शिव-शक्त्योश्च चिह्नस्यमेलनंलिङ्गमुच्यते॥“ अर्थात् शिव-शक्ति के चिह्नों का सम्मिलित स्वरूप ही शिवलिंग है। इस प्रकार लिंग में सृष्टि के जनक की अर्चना होती है। लिंग परमपुरुष सदाशिवका बोधक है। इस प्रकार यह विदित होता है कि लिंग का प्रथम अर्थ ज्ञापकअर्थात् प्रकट करने वाला हुआ, क्योंकि इसी के व्यक्त होने से सृष्टि की उत्पत्ति हुई। दूसरा अर्थ आलय है अर्थात् यह प्राणियों का परम कारण है और निवास-स्थान है। तीसरा अर्थ यह है कि प्रलय के समय सब कुछ जिसमें लय हो जाए वह लिंग है। समस्त देवताओं का वास होने से यह लिंग सर्वदेवमयहै। लिंग के आधार रूप में जो तीन मेखलायुक्तवेदिका है, वह भग रूप में कही जाने वाली जगद्धात्री महाशक्ति है। अत: आधार सहित लिंग जगत् का कारण है, उमा-महेश स्वरूपलिंग और वेदी केसमायोग में भगवान शंकर के अर्धनारीश्वररूप के ही दर्शन होते हैं। सृष्टि के समयपरमपुरुष सदाशिवअपने ही अर्धागसे प्रकृति (शक्ति) को पृथक कर उसके माध्यमसे समस्त सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं। इस प्रकार शिव- शक्ति का लिंग-योनिभाव और अर्द्धनारीश्वर भाव मूलत:एक ही है। सृष्टि के बीज को देने वाले परमलिंगरूपश्रीशिवजब अपनी प्रकृतिरूपाशक्ति (योनि) से आधार-आधेय की भाँति संयुक्त होते हैं, तभी सृष्टि की उत्पत्ति होती है, अन्यथा नहीं। श्रीमद्भगवद्गीताके 14वें अध्याय के तीसरे श्लोक से इस तथ्य की पुष्टि होती है- ममयोनिर्महद्ब्रह्मतस्मिन्गर्भदधाम्यहम्। ंभवत:सर्वभूतानांततोभवतिभारत॥ भगवान कहते हैं- महद्ब्रह्म(महान प्रकृति) मेरी योनि है, जिसमें मैं बीज देकर गर्भ का संचार करता हूँ और इसी से सम्पूर्ण सृष्टि (सब भूतों) की उत्पत्ति होती है।वस्तुत:अनादि सदाशिव-लिंगऔर अनादि प्रकृति-योनि के संयोग से ही सारी सृष्टि उत्पन्न होती है। इस दोनों के बिना सृष्टि की संरचना संभव नहीं है। शिवलिंग (परमपुरुष) जगदम्बारूपीजलहरीसे वेष्टित होने से प्रकृतिसंस्पृष्टपुरुषोत्तम है- पीठमम्बामयं सर्वशिवलिङ्गंचचिन्मयम्। अत: इसे जड समझना उचित न होगा। लिंगपुराणमें लिंगोद्भवकी कथा है।

सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य एक बार यह विवाद हो गया कि उन दोनों में कौन श्रेष्ठ है? इतने में उन्हें एक वृहत् ज्योतिर्लिगदिखाई दिया। उसके मूल और परिमाण का पता लगाने के लिए ब्रह्मा ऊपर गए और विष्णु नीचे, किंतु दोनों को उस लिंग के आदि-अन्त का पता न चला। तभी वेद ने प्रकट होकर उन्हें समझाया कि प्रणव (ॐ) में अ कार ब्रह्मा है, उ कार विष्णु है और म कार महेश है। म कार ही बीज है और वही बीज लिंगरूपसे सबका परम कारण है। लिंगपुराणशिवलिंगको त्रिदेवमयऔर शिव-शक्ति का संयुक्त स्वरूप घोषित करता है-

मूले ब्रह्मा तथा मध्येविष्णुस्त्रिभुवनेश्वर:। रुद्रोपरिमहादेव: प्रणवाख्य:सदाशिव:॥ लिङ्गवेदीमहादेवी लिङ्गसाक्षान्महेश्वर:। तयो:सम्पूजनान्नित्यंदेवी देवश्चपूजितो॥

शिवलिंगके मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा शीर्ष में शंकर हैं। प्रणव (ॐ) स्वरूप होने से सदाशिव महादेव कहलाते हैं। शिवलिंग प्रणव का रूप होने से साक्षात् ब्रह्म ही है। लिंग महेश्वर और उसकी वेदी महादेवी होने से लिगांचर्नके द्वारा शिव-शिक्त दोनों की पूजा स्वत:सम्पन्न हो जाती है। भगवान
सदाशिवस्वयं लिंगार्चन की प्रशंसा करते हैं- लोकं लिङ्गात्मकंज्ञात्वालिङ्गेयोऽर्चयतेहि माम्। न मेतस्मात्प्रियतर:प्रियोवाविद्यतेक्वचित्॥ जो भक्त संसार के मूल कारण महाचैतन्यलिंग की अर्चना करता है तथा लोक को लिंगात्मकजानकर लिंग-पूजा में तत्पर रहता है, मुझे उससे अधिक प्रिय अन्य
कोई नर नहीं है। इस तरह वस्तुत: शिवलिंग साक्षात् ब्रह्म का ही प्रतिरूप है। इस तथ्य को जान लेने पर साधक को शिवलिंग में ब्रह्म का साक्षात्कार अवश्य होता है।

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