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जाते हुए भी

November 7, 2014

मत जाओ दूर आँखॊं से,
अतृप्त हैं नयन हमारे।
ये दोनों दर्शन के प्यासे,
तेरी चाहत के मारे॥
ख्वाबों की कोई सीमा नहीं,
चाहतों का न कोई अन्त।
जिह्वा बीच में सिमटी हुई,
चारों ओर फैले हैं दन्त॥
सुन्दरता-कुरूपता की माप नहीं,
ये तो आँखों की चाहत है।
दिल से दिल का मामला है ये,
इसमें तो भरी नजाकत है॥

मिलन की बेला

October 4, 2014

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हम दोनों के मिलन की बेला,

तुझे कुछ याद दिलाना था।

आधे अधूरे वादों को,

पूरा कर दिखाना था॥

मुझे मिलना था तुझसे,

पुरानी रीत को निभानी थी।

जन्म जन्मान्तर का यह रिश्ता,

बुजुर्गों से सुनी कहानी थी॥

ब्रह्मा ने ने ब्रह्मानी को पाया,

महेश के घर भवानी थी।

विष्णु- लक्ष्मी का अटूट है रिश्ता,

दुनिया को यही बतानी थी॥

इसी क्रम में मिले हम दोनों,

विधि ने लिखी कहानी है।

मिलकर पार करेंगे भव बाधा,

जिन्दगी की कड़ी निभानी है॥

राम से पहले सीता का नाम,

राधा, कृष्ण की पहचान बनी।

शिला रूप में शिव का पूजन,

तुझसे बनी पहचान अपनी॥

यदि मैं अपने पथ से भागा,

आगे बाढ़ ज्ञान दिया,

जब तू विचलित हुई कभी,

मैने तेरा हाथ थाम लिया॥

कैसा भी हो रूप- रंग,

कैसी भी हो काया।

तू मेरी हो और मैं तेरा,

दोनों एक दूजे की छाया।।

लक्ष्य भले हों अलग अलग,

राही दोनों एक मार्ग के।

विपत्तियाँ सारी टल जाएँगी,

जब साथ हो एक दूजे के।।

एक एक मिलकर दो बनता,

और कभी बन जाता ग्यारह।

हम दो मिलकर भी एक हैं,

हमेशा हमारे पौ रहेंगे बारह।।

तुझमें मुझमें कोई भेद नहीं,

सिक्के के दो पहलू जैसा।

दिखने में हम दो भले हों,

एक है अन्तर्मन की दशा॥

काँटे गड़े तेरे पाँवों में,

चुभन मुझे मसूस हुई।

जमाने ने जब मुझे सताया,

चोट तुझे लगी और जख्मी हुई॥

तूने सहा जो भी वार हुए,

जख्म तेरे सीने में लगी।

धूप में तू बन गयी छतरी,

चिन्ताएँ मेरी, रातों में तू जगी॥

जब ब्याधियों ने तुझे सताया,

नींद गयी, चैन गया।

भूल गया मैं अपना फ़न॥

सपने संजोए साथ साथ में,

खुशियाँ बाँटी संग मे मिलकर।

कभी मैं हूँ तेरा स्वप्न,

कभी तू आती सपना बनकर॥

तू लक्ष्मी मेरे आँगन की,

करती रक्षा दुर्गा बनकर।

माया बन सब्ज बाग दिखाती,

पथ दिखलाती सहायक बन कर॥

कंचन की प्रभा से आलोकित,

करती तू मेरे आँगन को।

नित्य जीवन में उत्साहित करती,

प्रेरणा देती विजय पाने को॥

यही तो जीवन

September 28, 2014

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मौत से अब भय कैसा?
हो चुकी है आशनाई।
कानों में अनवरत गूँज रही,
मधुर आवाज में शहनाई।
मृत्यु ने बना रखी,
बड़ी सुन्दर सी एक फुलवारी,
छुप छुप कर घुसती जिन्दगी अन्दर,
क्योंकि “वो” कर रहा रखवारी।
इस भरे पूरे जग से,
जा रहे सब बारी बारी।
किसने देखा है अपना कल,
कब है किसकी पारी ?
जो आया है वो जाएगा,
मूल मंत्र है जीवन की।
काँटें और फूल मिलेंगे संग संग,
होगी वही जो इच्छा नियति की।
आँखों पे विश्वास नहीं होता,
मन को नहीं मिलता संतॊष।
जाने वालों को कौन रोक सका है?
नहीं काम आते हमारे संपदा-कोष।
नियति का खेल अजीब है,
क्या से क्या हो जाता है।
योजना बन रही बरसों की,
पल में धराशायी हो जाता है।
जिन्दगी का घेरा है चतुर्दिक,
मगर कुछ फ़ासले रखकर,
मगर, धर दबोचती मौत,
पलक झपकते ही फ़ंदे में कसकर।