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यही तो जीवन

September 28, 2014

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मौत से अब भय कैसा?
हो चुकी है आशनाई।
कानों में अनवरत गूँज रही,
मधुर आवाज में शहनाई।
मृत्यु ने बना रखी,
बड़ी सुन्दर सी एक फुलवारी,
छुप छुप कर घुसती जिन्दगी अन्दर,
क्योंकि “वो” कर रहा रखवारी।
इस भरे पूरे जग से,
जा रहे सब बारी बारी।
किसने देखा है अपना कल,
कब है किसकी पारी ?
जो आया है वो जाएगा,
मूल मंत्र है जीवन की।
काँटें और फूल मिलेंगे संग संग,
होगी वही जो इच्छा नियति की।
आँखों पे विश्वास नहीं होता,
मन को नहीं मिलता संतॊष।
जाने वालों को कौन रोक सका है?
नहीं काम आते हमारे संपदा-कोष।
नियति का खेल अजीब है,
क्या से क्या हो जाता है।
योजना बन रही बरसों की,
पल में धराशायी हो जाता है।
जिन्दगी का घेरा है चतुर्दिक,
मगर कुछ फ़ासले रखकर,
मगर, धर दबोचती मौत,
पलक झपकते ही फ़ंदे में कसकर।